कैसे शुरू हुआ कश्मीरी हिन्दुओं का पलायन कश्मीर से

कैसे शुरू हुआ कश्मीरी हिन्दुओं का पलायन कश्मीर से

क्या फिल्म कश्मीर फाइल्स में दिखाई गयी प्रताड़नाएं सच हैं? क्या कश्मीरी पंडितों पर, आघात पर आघात होते रहे, इतने गहरे की डेढ़ लाख से भी ज़्यादा कश्मीरी पंडितों को अपनी जन्मभूमि छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा? शायद हाँ। कश्मीर फाइल्स ने, 1990 में जो कश्मीरी पंडितों के साथ हुआ बखूबी परदे पर उतारा है। कश्मीर से विस्थापित हुए लोग आज 22 सालों बाद भी इंसाफ के लिए लड़ रहे हैं। किसी की आपबीती बताना गलत नहीं लेकिन फिर भी इस फिल्म को लेकर काफी विवाद फ़ैल रहा है। कई राजनीतिक पार्टियों ने इस फिल्म को बैन करने की भी मांग कर रही हैं। उनका कहना हैं की ये फिल्म सांप्रदायिक नफरत फैला सकती है। कई बुद्धिजीवियों का यह भी कहना है की कश्मीर फाइल्स में तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर दिखाया गया है। 

 

पर असल विवाद तब शुरू हुआ जब कश्मीर फाइल्स के डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री ने ये ट्वीट किया की कपिल शर्मा ने अपने शो पर कश्मीर फाइल्स को प्रमोट करने से मना कर दिया है और #bankapilsharmashow हैशटैग शुरू किया। इस ट्वीट के बाद धीरे-धीरे ये विवाद बढ़ता गया। अब ये विवाद एक फिल्म को प्रमोट करने का एक साधन है या वाकई इस विवाद मैं कोई सच्चाई है यह कोई नहीं बता रहा, कपिल शर्मा की तरफ से भी खुल कर इस विवाद पर कोई टिपण्णी नहीं आई है।

 

बहरहाल, कश्मीरी पंडितों का मुद्दा कोई नया मुद्दा नहीं है, उनकी ये जंग सन 1980 से चल रही है और कश्मीर फाइल्स के ज़रिये उनका दर्द साफ़ नज़र आता है। इस फिल्म जो नहीं दिखाया वो है उस वक्त की सरकार की कश्मीर के आम लोगों को संरक्षण पहुंचाने में नाकामी। इस फिल्म यह भी नहीं दिखाया की किस तरह आज तक भी सरकारी स्तर पर कश्मीरी पंडितों को ज़्यादा रियायतें नहीं मिल पायी हैं। विवादों से हटकर यदि ये फिल्म विस्थापित कश्मीरियों के लिए अगर कुछ कर पाई तो यह फिल्म सही मायनों में सफल मानी जाएगी। किन्तु एक समाज या धर्म को निशाना बनाना भी सही नहीं है।

 

कश्मीर में हुआ नरसंघार केवल एक धर्म के विरुद्ध नहीं था बल्कि एक बहुत बड़ी राजनितिक षड्यंत्र का हिस्सा था। उस वक्त हुई कई हत्याओं की उस वक्त न कोई तफ्तीश की गई और न ही कोई कदम उठाया गया दहशतगर्दों के खिलाफ। कश्मीर में हिंसा कोई नई बात नहीं है। 

 

कश्मीर में हिंसा का और लोगों के पलायन का सिलसिला आज़ादी के कुछ हफ़्तों बाद ही शुरू हो गया था। भारत को अंग्रेजी शासन से 15 अगस्त 1947 को आज़ादी मिली लेकिन कश्मीर भारत का हिस्सा 27 अक्टूबर 1947 को बना जब वहां के राजा हरी सिंह ने भारत की प्रभुता को स्वीकार किया। उस दौरान कई हिन्दू और सिख गुटों ने मिलकर कश्मीर में आये और रह रहे मुस्लमान नागरिकों को वहां से हटाने के लिए नरसंघार का सहारा लिए। उस समय करीब ढाई लाख से भी ज़्यादा मुसलमानों को कश्मीर छोड़ना पड़ा। महात्मा गाँधी ने भी उस नरसंघार के काफी निंदा की थी। 

 

उसके बाद कश्मीरी पंडितों पर 1980 और 1990 के दशक में जो हुआ वो नरसंघार भी सत्ता की खींच तान का नतीजा थी।ये तो लाज़मी है की किसी पर भी हुए अमानव्य अत्याचार को दिखाना बिलकुल गलत नहीं, लेकिन आधी सच्चाई हमेशा पूरे सच पर पर्दा डालती है।

 

किसी भी सामाजिक तथ्य को दिखाना एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है और अगर वो लक्ष्य पूरी तरह से हासिल नहीं हो पाता तो वही होता है जो आजकल कश्मीर फाइल्स के साथ हो रहा है। फिल्मकार और भारतीय फिल्म जगत का जनमना नाम बोइशाली सिन्हा ने भी यही कहा की, "हमें समाज की किसी भी कहानी को पूरी ज़िम्मेदारी से परदे पर उतरना चाहिए।"

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